किसी को उसी तरह पसंद करना चाहिए, जिस तरह वह है : प्राची तेहलान

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प्राची तेहलान को ‘दीया बाती और हम’ सीरियल में उसके आरजू किरदार के लिए लोगों
ने काफी सराहा। लोगों ने पसंद भी किया। अब प्राची सीरियल ‘इक्यावन’ के माध्यम से
टेलीविजन दुबारा वापसी कर रही हैं। यह शो गुजरात के शहरों कच्छ और अहमदाबाद
की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें वहां की समृद्ध, रंगबिरंगी और अनूठी संस्कृति को
दिखाया गया है। प्राची का किरदार शो में अनोखी परवरिश के कारण अपनी उम्र की
बाकी लड़कियों से अलग, दिखाया गया है। पेश है बातचीत के कुछ अंश :

एक साल बाद टीवी पर लौटना कैसा लग रहा है?

‘आरजू’ का मेरा किरदार लोगों ने काफी सराहा था और लोगों ने मुझे काफी पसंद किया
था। मैं ये जानकर बेहद उत्साहित हूं कि ‘इक्यावन’ के जरिये मैं टेलीविजन पर वापसी
कर रही हूं। इससे ज्यादा उत्साहजनक और क्या हो सकता है कि सुशील का किरदार
इतना अनूठा और चुनौतीपूर्ण है। अक्सर एक लड़की से ये उम्मीद की जाती है कि वो
‘नारीत्व’ के सांचे में पूरी तरह ढल जाये। उसे लगातार सिखाया जाता है और उससे
बदलाव की उम्मीद की जाती है। साथ ही लड़की के लिये समाज द्वारा तय किये गये
नियमों के अनुसार उसे ढालने की इच्छा रहती है।

सुशील के किरदार के बारे में कुछ बतायें और ये कितना अनोखा है?

ये मेरे करिअर के सबसे रोमांचक किरदारों में से एक है। सामान्यतौर पर, किसी भी
लड़की से समाज कुछ खास तरह की खूबियों की उम्मीद करता है, जैसे उन्हें सुंदर,
सुशील, समझदार और शांत होना चाहिये। मैं जो किरदार निभा रही हूं उसका नाम
सुशील है, लेकिन वो अपने नाम के बिलकुल उलट है। उसे परिवार के चार पुरुषों ने
मिलकर पाला है; उसके पिता, दादाजी, चाचा और मामा। अनोखी परवरिश के कारण ही
वो अपनी उम्र की बाकी लड़कियों से अलग है। उसे इस बात का कोई दुख नहीं है कि वह
दूसरी लड़कियों की तरह नहीं दिखती, बस वह जैसी है, वैसे ही अपने को अपनाती है।
वह इस धारणा पर जोर देती है कि ‘आप जैसे हैं, वैसे ही खुद को प्यार करें।

सुशील बाकी लड़कियों से किस तरह अलग है?

सुशील कई मायनों में औरों से अलग है। लड़कियां अपनी बढ़ती उम्र में जिस तरह का
हुनर सीखती हैं, उसने वो चीजें नहीं सीखी। लड़कियों से उलट लंबी कद-काठी के कारण
उसे ‘ऊंट’ कह कर बुलाया जाता है, वो अपनी उम्र की बाकी लड़कियों से हमेशा ही अलग

रही है। उसकी उम्र की लड़कियां जब गुड़ियों के साथ खेलती हैं, तब सुशील जन्माष्टमी पर
लड़कों को पहले मटकी फोड़ने की चुनौती देती नजर आती है। उसे घर के काम करने में
कतई रुचि नहीं है और उसे चाय बनाना, कपड़े तह करना आदि जैसे काम बिल्कुल नहीं
आते। ऐसे में आप यह सोचकर दंग रह जायेंगे कि आखिर उसका नाम सुशील क्यों रखा
गया।

इस शो के कॉन्सेप्ट के बारे में कुछ बतायें?

‘इक्यावन’ सुशील और पारेख परिवार की कहानी है, जिसमें उसके पिता, एक मामा, एक
चाचा और उसके दादाजी रहते हैं। यह शो गुजरात के सबसे आकर्षक शहरों; कच्छ और
अहमदाबाद की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें गुजरात की समृद्ध, रंगबिरंगी और अनूठी
संस्कृति को दिखाया जायेगा।

इस किरदार में खुद को ढालने के लिये आपने किस तरह की तैयारियां की हैं?

खुद एक लड़की होने और खेल की पृष्ठभूमि से आने के कारण, सुशील का किरदार मेरे
काफी करीब था। मैंने इसकी कहानी को समझा और सुशील के किरदार में खुद को ढालने
की कोशिश की। इस किरदार में खुद को ढालने के लिये ये समझना जरूरी था कि इस
समाज में रहने के दौरान मेरे किरदार को कैसा महसूस होगा। इससे चीजें चुनौतीपूर्ण होने
के बजाय आसान हो गई।

हम जिस समाज में रह रहे हैं, उसमें सुशील का किरदार कितना मेल खाता है?

हमारा समाज लड़कियों से ये उम्मीद करता है कि वो कुछ खास नियमों और व्यवहार के
अनुसार चले। इस कारण से हर लड़की खुद को इस किरदार से जोड़कर देख पायेगी।
सुशील के किरदार का एक अन्य पक्ष है जो लड़कियों को इससे जोड़ता है, वो ये है कि
जीवन के हर पड़ाव पर स्त्रियों से जिस खास तरह के गुणों के होने की उम्मीद की जाती
है, उसकी कमी के बावजूद ‘आप जैसे है, वैसे ही खुद से प्यार करें’। उसका मानना है कि
हमें किसी को उसी तरह पसंद करना चाहिये, जिस तरह वो है, ना कि समाज हमसे जैसा
होने की उम्मीद करता है।

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