व्यक्तित्व को निभाने की कोशिश करूंगा : संजय मोने

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Sanjay Mone as PL Deshpande

पी.एल. देशपांडे से जुड़ी सबसे अच्छी यादें कौन-सी हैं, क्योंकि आपको खुद उनका एन्साइक्लोपीडिया कहा जाता है?

मैं कोई एन्साइक्लोपीडिया नहीं हूं, लेकिन पी.एल देशपांडे को बहुत अच्छी तरह जानता हूं। इससे ज्यादा मैं उनका एक परिचित हूं। वह बहुत सक्रिय इंसान थे, जीवन और ऊर्जा से भरे हुए। उनमें सेंस ऑफ ह्नयूमर स्वाभाविक रूप से था। उन्होंने जो कुछ भी किया वह सर्वश्रेष्ठ था और मैंने उनके जैसा व्यक्तित्व नहीं देखा है। पी.एल देशपांडे एक शिक्षाविद्, कलाकार, निर्देशक, नाटकार, कवि, संगीतकार और बेहतरीन हारमोनियम प्लेयर थे। वह जब भी बोलना शुरू करते थे, हमेशा अपने विचार खुलकर सामने रखते थे। भारतीय टेलीविजन के वह पहले डायरेक्टर जनरल थे।

आपके कंधों पर पी.एल देशपांडे का किरदार निभाने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, आपको कैसा महसूस हो रहा है?

मुझे थोड़ी घबराहट महसूस हो रही है, क्योंकि वह एक आजाद ख्याल स्वभाव के थे और लोग उनसे आसानी से मिल सकते थे। मुझे लगता है कि इसी वजह से हजारों या लाखों लोग उन्हें मानते थे। वे लोग उन्हें बहुत अच्छी तरह जानते थे, क्योंकि वह हर किसी से बात करते थे। उनके बारे में लोगों की यह निश्चित राय थी और मुझे उन्हें जीने की जरूरत है।

इस भूमिका के लिये क्या आपने कोई तैयारी की है और आपको किसी चुनौती का सामना करना पड़ा है?

दरअसल, हमारे पास तैयारी करने का ज्यादा समय नहीं है, लेकिन मैंने उनकी सभी किताबें पढ़ी हैं। मैं उनके घर पर भी जाया करता था। मैं उनकी नकल करने की कोशिश नहीं करूंगा, बल्कि उनके व्यक्तित्व को निभाने की कोशिश करूंगा।

पी.एल देशपांडे का कोई एक काम या फिर किताब जो आपको सबसे ज्यादा पसंद हो?

सबसे पहले तो ‘व्यक्ति आनी वाली’, दूसरी ‘भत्याची चालैंड’ और तीसरी ‘असमी असमी’। इसके बाद उन्होंने एक किताब लिखी, ‘मराठी वांग्यमाचा इतिहास’, जोकि हास्य से भरपूर है। मुझे ‘व्यक्तिवाली’ पसंद है, क्योंकि मैं उनके दृष्टिकोण को सलाम करता हूं। इन दिनों हम सैकड़ों और हजारों लोगों से मिलते हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि हम किसी पर गौर करते हैं। हम बस देखते हैं, बातें करते हैं और भूल जाते हैं, इसलिये मुझे उनके परखने की ताकत पसंद है। जब हम उनकी किताबें पढ़ते हैं, तो हमें महसूस होता है कि ऐसी चीजें तो हमारे साथ भी हुई हैं लेकिन हमने कभी उसे उस तरह से नहीं देखा।

26 सालों के अनुभव के साथ, मराठी फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज कलाकार के तौर पर मशहूर होने के बाद अब हिन्दी टेलीविजन का हिस्सा बनने पर कैसा महसूस हो रहा है?

दरअसल, केवल भाषा का ही अंतर है, वरना सारी चीजें समान हैं।

इस भूमिका को करने का कोई खास कारण और क्यों दर्शकों को इस देखना चाहिये?

सामाजिक रूप से एक क्रिएटिव व्यक्ति के तौर पर मैं उन्हें पसंद करता हूं। उन्होंने हर चीज में बेहतरीन काम किया है, ऐसा आमतौर पर लोगों के साथ नहीं होता है। बहुत कम लोग ऐसा कर पाते हैं। उन्होंने जीवन में जो कुछ भी किया है मैं वह निभाने जा रहा हूं, जोकि अप्रत्यक्ष रूप से मेरे लिये संतोषजनक है। दूसरी बात कि एक और मजेदार वाकया है। मेरे पिता भी कुछ सालों के लिये एक अभिनेता थे और उसके बाद उन्होंने टैक्सटाइल में अपना कॅरियर बनाया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हालांकि, उन्होंने नागपुर में पी.एल देशपांडे के एक नाटक ‘सुंदर मी होनार’ में अभिनय किया था। उस नाटक में मेरे पिता ने संजय नाम का एक किरदार निभाया था। वैसे, वह वहां टूर के लिये गये थे, मेरा जन्म यहां हुआ है। इसलिये, उन्होंने मेरा नाम संजय रखा।

पी.एल देशपांडे से मिली जीवन की कोई ऐसी सीख, जिस पर आप रोशनी डालना चाहेंगे?

मैंने सीखा कि साहित्य में हमेशा से ही ह्नयूमर मौजूद रहता है। इसलिये, पी.एल देशपांडे की सारी किताबें पढ़ने के बाद, मैंने कुछ कॉलम लिखे और लोगों ने मुझसे कहा कि मैंने उन्हें पी.एल देशपांडे की याद दिला दी।

 

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